'बड़े घर की बेटी' कहानी का वाचन एवं 'कवि सम्मेलन' में बही रसधार
वाराणसी] 09 नवम्बर] मोतीलाल मानव उत्थान समिति] कुशवाहा भवन] चन्दुआ छित्तूपुर में आयोजित 27वें बनारस पुस्तक मेला के तीसरे दिन प्रेमचन्द की कहानी **बड़े घर की बेटी** की पूरी कहानी सुनाई गयी। प्रेमचन्द की यह कहानी पारिवारिक मर्मस्पर्शी है। जिसमें पारिवारिक कलह की परिस्थितियों के झगड़े का चित्रण किया गया है। आनन्दी एवं उसके देवर में झगड़ा उस समय उत्पन्न होता है। जब लाल बिहारी सिंह के दाल में देशी घी नहीं पड़ा। लालबिहारी ने अपनी भाभी को मयके पर ताना के साथ खड़ाऊ से वार किया था। उस आनन्दी बर्दाश्त नहीं कर पाती है। यहीं बेनी माधव के परिवार का झगड़ा शुरु होता है। यह झगड़ा परिवार से निकलकर बाहर चर्चा का विषय बनने लगता है जिससे परिवार की मान-मर्यादा पर प्रभाव दिखने लगा। यहां आनन्दी के पति श्रीकंठ ने सारी बात सुनने के बाद उसका निर्णय स्तब्धकारी होता है। उसका यह कहना कि छोटे भाई का मुँह नहीं देखना चाहता है। छोटा भाई अपनी गलतियों का क्षमा मांगता है पछतावा करते हुये कहता है कि हमें भाभी पर हाथ नहीं उठाना चाहिये था। आनन्दी ने देवर की की गयी गलतियों को माफ करते हुये घर को टुटने से बचा लिया। यहीं बड़े घर की बेटी का प्रभाव था। आनन्दी के उच्च संस्कार उसे सचमुच बड़े घर की बेटी बनाते है। उसने घर के बंटवारे को रोक लिया। आज मोबाइल एवं इण्टरनेट के युग में इसका ठीक विपरित हो रहा है। जहां तक हो सके आत्मसम्मान को ठेस नहीं पहुँचाना चाहिये।
कहानी को संस्था के सचिव, एम.एस. कुशवाहा ने बहुत ही मार्मिक ढंग से सुनाया। इसके पश्चात बौद्धायन सोसाइटी द्वारा आयोजित कवि सम्मेलन में डॉ. मंजरी पाण्डेय के नेतृत्व में, डॉ. फिरोज ने गीत, ओमप्रकाष चंचल ने गजल, श्रुति गुप्ता ने गीत, झगड़ू भईया ने हास्य व्यंग्य की रचनायें प्रस्तुत की। संचालन, नवल किशोर गुप्त ने किया।
इस अवसर पर परशुराम राम, बद्रीनाथ मौर्य, अभय चौधरी आदि लोग उपस्थित रहे। धन्यवादज्ञापन प्रबंधक, मिथिलेश कुमार कुशवाहा ने किया।